सृजन-यात्रा
सुभाष नीरव का रचना-सफ़र
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012
लघुकथा
शनिवार, 3 मार्च 2012
लघुकथा

लेखक की आँख हर समय अपने समय, समाज और परिवेश पर लगी रहती है। वह वातावरण और परिवेश जहाँ उसका अधिकांश समय व्यतीत होता है, उसे प्रभावित करता रहता है। वह उससे बच नहीं सकता। मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा सरकारी दफ़्तर में गुज़रा होने के कारण मुझे मेरी बहुत-सी रचनाओं के बीज इसी वातावरण और परिवेश से मुझे मिले। ‘दौड़’, ‘गोली दागो रामसिंह’ ‘भेड़िये’, ‘सूराख’ कहानियाँ और ‘अपने क्षेत्र का दर्द’, ‘रफ़ कॉपी’, ‘चन्द्रनाथ की नियुक्ति’, ‘चीत्कार’, ‘धूप’ ‘बीमारी’, ‘रंग परिवर्तन’, ‘कबाड़’, ‘चोर’ आदि लघुकथाएँ इसी वातावरण और परिवेश की उपज हैं। दफ़्तरी माहौल पर लिखी अपनी लघुकथा ‘चन्द्रनाथ की नियुक्ति’ को मैं यहाँ अपनी ‘लघुकथाओं की श्रृंखला’ की अगली कड़ी के तौर पर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। आपकी राय की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
-सुभाष नीरव
चन्द्रनाथ की नियुक्ति
सुभाष नीरव
उप सचिव घर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि फोन की घंटी घनघना उठी। दूसरी ओर सचिव महोदय थे। उप सचिव अपनी कुर्सी पर से उठ-से गये। सचिव महोदय बेहद गुस्से में लग रहे थे। वह चन्द्रनाथ की नियुक्ति के विषय में पूछ रहे थे। चन्द्रनाथ मन्त्री जी के गाँव का आठवीं पास बेरोजगार युवक था। वह मन्त्री जी की सिफारिश पर मंत्रालय में तदर्थ आधार पर चपरासी पद के लिए चुना गया था। लेकिन, अभी तक उसे नियुक्ति-पत्र नहीं मिला था। सचिव महोदय ने कड़े शब्दों में कहा कि उन्हें एक हफ्ते के भीतर रिपोर्ट मिलनी चाहिए कि क्या हुआ।
उप सचिव महोदय को शाम को अपने एक मित्र की लड़की की शादी में सम्मिलित होना था। उन्हें देर हो रही थी। पाँच बजे आफिस छोड़ देना चाह रहे थे वह। झल्लाते हुए उन्होंने अवर सचिव का नम्बर घुमाया। दूसरी ओर से फोन उठाते ही वह पिल पड़े, ''क्या करते हैं आप ?... छोटे-छोटे काम भी नहीं कर सकते ? चन्द्रनाथ की नियुक्ति में देरी क्यों हो रही है ? मुझे तीन दिन के भीतर रिपोर्ट दो कि आपने क्या किया ?''
अवर सचिव महोदय सुबह से ही खुश मूड में थे और वह इसी मूड में घर लौटना चाह रहे थे। पत्नी को सिनेमा ले जाने का वायदा करके आये थे। इस एक फोन ने उनका सारा मूड खराब कर दिया। उन्होंने घड़ी देखी, पाँच बज रहे थे। चपरासी को बुलाकर उन्होंने कहा, ''भल्ला साहब को तुरन्त मेरे पास भेजो।''
भल्ला साहब प्रशासन अनुभाग में अनुभाग अधिकारी थे। अवर सचिव के बुलावे पर दौड़ते हुए उनके केबिन की ओर लपके।
''यह क्या काम हो रहा है, भल्ला जी ?... छोटे-मोटे काम के लिए इतना समय ?... चन्द्रनाथ की नियुक्ति में इतनी देर क्यों ?... आप लोग काम नहीं करते और ऊपर से हमें... एक चपरासी की नियुक्ति में इतनी देर और वह भी मन्त्री जी के आदमी के मामले में! मुझे दो दिन में रिपोर्ट दो कि क्या किया है आपने ?... समझे!''
भल्ला साहब अवर सचिव के केबिन से निकलकर सीधे सम्बन्धित क्लर्क के पास पहुँचे और एकाएक बरस पड़े, ''रामलाल जी, आप क्यों बेवजह केस को दबाये रखते है ं?... यह चन्द्रनाथ की नियुक्ति क्यों नहीं हो रही ?''
''सर, पुलिस वैरीफिकेशन के कागज कल ही प्राप्त हुए हैं। मैं सोच रहा था, औरों के भी आ जाते तो एक साथ ही एप्वाइंटमेंट लेटर...''
''अरे, आते रहेंगे औरों के... आप चन्द्रनाथ की एप्वाइंटमेंट लेटर तैयार कीजिये। आज, अभी बैठकर...'' भल्ला साहब जोर देकर बोले। अपना ब्रीफकेस बन्द करते हुए वह बुदबुदाये, ''पार्टी में जाना था, लेट हो गया।'' और कमरे से तेजी के साथ बाहर निकल गये।
पूरा कमरा खाली हो चुका था। केवल रामलाल ही अपनी सीट पर अभी तक बैठा हुआ था- चन्द्रनाथ की फाइल खोले। एकाएक उसे याद आया, आज तो उसे पत्नी की दवा लानी है। और मिट्टी का तेल भी कई दिनों से खत्म है! उसने फुर्ती से मेज पर रखे कागज समेटे और उठ खड़ा हुआ। एक बार घड़ी की ओर देखा और फिर तेजी से कमरे से बाहर निकल गया।
चन्द्रनाथ की फाइल मेज पर रखी पेंडिंग फाइलों में पुन: पहुँच गयी।
बुधवार, 8 फरवरी 2012
लघुकथा

मित्रो
कभी-कभी हमें अपनी नई लिखी कोई रचना अधिक संतोषजनक नहीं लगती। ऐसा नहीं है कि वह रचना नहीं होती, पर हम उसमें कुछ और अच्छा और श्रेष्ठ लाने की कोशिश करते रहते हैं। एक ज़माना था कि ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक में छपना बहुत बड़ी बात समझी जाती थी। हर नया-पुराना लेखक उसमें छपने को लालायित रहा करता था। धर्मवीर भारती जी सम्पादक हुआ करते थे। कहा यह भी जाता था कि ‘धर्मयुग’ में यदि किसी की कहानी छप जाती थी तो उसे कथाकार मान लिया जाता था। उस समय के लेखक ‘धर्मयुग’ में किसी न किसी रूप में प्रवेश पाना चाहते थे। कहानी, कविता, बाल कविता अथवा बाल कहानी के रूप में। जब मेरी लघुकथाएं उन दिनों ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित हुईं और साथ ही साथ लघुकथा को पूर्णत: समर्पित लघु-पत्रिकाओं में भी छपने लगीं, तो एक दिन मुझे ‘धर्मयुग’ से मनमोहन सरल जी का पत्र आया। उन्होंने यह बताते हुए कि ‘धर्मयुग’ में अच्छी लघुकथाएं प्रकाशित करने का सिलसिला प्रारंभ किया जा रहा है(तब ‘धर्मयुग’ में लघुकथाएं नहीं छपा करती थीं), मुझसे उन्होंने दो अप्रकाशित लघुकथाएं भेजने को लिखा था। उस पत्र को पाकर मेरे पैर ज़मीन पर नहीं पड़ते थे। एक नशा-सा तारी हो गया था। पर सवाल था कि कौन-सी लघुकथाएँ भेजूं। लिखी हुईं लघुकथाओं में दो-तीन को छोड़कर सभी प्रकाशित हो चुकी थीं। अब संकट यह था कि जो दो-तीन लघुकथाएं अभी तक अप्रकाशित थीं, उनसे मैं स्वयं संतुष्ट नहीं था। और जिस तारीख़ तक लघुकथाएं मांगी गई थीं, वह निकट थी। दो-चार दिन नई लघुकथा लिखने में जाया किए, पर कामयाबी नहीं मिली। तब, अप्रकाशित लघुकथाओं पर फिर से काम किया और जब उनमें से दो लघुकथाएँ कुछ ठीकठाक –सी लगीं, तो मैंने ‘धर्मयुग’ को पोस्ट कर दीं। मन में धुकधुक-सी लगी रही कि पता नहीं वे लघुकथाएँ ‘धर्मयुग’ को पसन्द आती भी हैं कि नहीं। पर दोस्तों, जल्द ही एक लघुकथा ‘धर्मयुग’ में छप गई। अब तो मैं हवा में उड़ने लगा। जहाँ मैं रहता था यानी आर्डनेंस फ़ैक्टरी मुरादनगर के एस्टेट में, वहाँ कवि तो ज्यादा थे, परन्तु कथा-कहानी से जुड़े मित्र दो-चार ही थे। उन्हें खुद जाकर ‘धर्मयुग’ का वह अंक दिखाया और उन्होंने लघुकथा पढ़कर मुझे बधाई दी। वह लघुकथा ‘बड़े बाबू’ शीर्षक से ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुई थी। बहुत बाद में जब अपनी लघुकथाओं पर पुन: काम कर रहा था, तो लघुकथा के क्षेत्र में जमे हुए और सशक्त लेखकों से इस रचना पर भी बात हुई। उन्होंने इसके शीर्षक को बदलने की बात की। कथाकार बलराम अग्रवाल का कहना था कि इस लघुकथा में सरकारी दफ़्तर की जिस बीमारी की ओर संकेत किया गया है, वह बीमारी तो हर दफ़्तर में व्याप्त है। इसलिए इस लघुकथा का शीर्षक ‘बड़े बाबू’ से ‘बीमारी’ कर दिया गया और आज यह लघुकथा इसी शीर्षक से मेरे पहले एकल लघुकथा संग्रह ‘सफ़र में आदमी’ में शामिल है। इसे मैं यहाँ अपने ब्लॉग पर अपनी लघुकथाओं की श्रृंखला की अगली कड़ी के तौर पर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। आपकी राय की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
-सुभाष नीरव
बीमारी
सुभाष नीरव
बच्चे को अस्पताल से दवा दिलाकर जब रामदीन दफ्तर पहुँचा तो बारह से ऊपर का समय हो रहा था। बड़े बाबू उसे देखते ही गुर्राये।
''यह दफ्तर आने का समय है ?''
''साहब, बच्चा कल से बीमार है। अस्पताल ले गया था। वहीं से आ रहा हूँ।'' रामदीन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ''सुबह दफ्तर आया था। उस वक्त तक आप नहीं आये थे। इसलिए छोटे बाबू से कहकर गया था।''
''कहकर गया था। हुंह...'' बड़े बाबू का गुस्सा सातवें आसमान पर था। बोले, ''यहाँ इतना काम पड़ा है। यह कौन करेगा?... क्या मैं ?... बिना बताये काम से गैर-हाज़िर रहता है। रिपोर्ट करनी पड़ेगी। आये दिन बहाना। कभी बीवी बीमार है तो कभी बच्चा।''
रामदीन बड़े बाबू की डांट सहता हुआ चुपचाप अपने काम में लग गया।
''रामदीन...'' लंच के बाद, बड़े बाबू ने रामदीन को अपने पास बुलाया। आवाज में मिसरी घुली थी।
''जी, साहब।''
''ज़रा हमारा एक काम तो करना। सुपर-बाजार में कंट्रोल पर कॉपियाँ मिल रही हैं। बच्चों के लिए मंगवानी थी।'' जेब से पैसे निकालते हुए उन्होंने कहा।
''पर साहब, वहाँ तो देर लग जायेगी। बहुत लम्बी लाइन लगती है। और इधर काम भी...''
''अरे, छोड़ काम...। काम तो होता ही रहता है। मैं सम्हाल लूँगा।'' उन्होंने उसको पैसे थमाते हुए कहा, ''और सुन, कॉपियाँ लेकर इधर मत आना। मेरे घर देते हुए अपने घर चले जाना, समझे।... तुम्हारा बच्चा बीमार है न। यहाँ की फिक्र मत कर। मैं सब सम्हाल लूँगा।''
बुधवार, 4 जनवरी 2012
लघुकथा

मित्रो
लघुकथा लिखना मेरे लिए कहानी लिखने से अधिक दुष्कर कार्य रहा है। बहुत सी लघुकथाएं लिखीं और फाड़ दीं। कारण, मैं खुद ही उनसे संतुष्ट नहीं था। कई बार तो मित्रों को अच्छी लगने वाली और प्रकाशित हो चुकी लघुकथाओं को भी मुझे खारिज करना पड़ा। रमेश बत्तरा मेरे अच्छे मित्रों में से रहे। मेरा अक्सर उनसे मिलना होता था। वह कहानी और विशेषकर लघुकथा के बहुत सशक्त लेखक तो थे ही, एक अच्छे पारखी भी थे। मैं अपने आत्मकथ्य में यह स्वीकार कर चुका हूँ कि लघुकथा लेखन में और पंजाबी से हिंदी अनुवाद कर्म में मैं न आया होता, यदि रमेश बत्तरा से मेरी मित्रता न हुई होती। पंजाबी की पहली कहानी का अनुवाद मैंने उनके कहने पर ही ‘सारिका’ के लिए किया था और अपनी पहली लघुकथा भी मैंने उनके कहने पर लिखी थी जो ‘सारिका’ के ‘लघुकथा विशेषांक में ‘कमरा’ शीर्षक से छ्पी थी। वह मुझे निरन्तर लघु पत्रिकाओं में लघुकथाएं भेजने के लिए प्रेरित करते रहते थे। अपने शुरूआती दिनों में (लघुकथा लेखन के सन्दर्भ में) मैंने एक लघुकथा ‘मासूम सवाल’ शीर्षक से लिखी और एक रविवार राज नगर, गाजियाबाद स्थित उनके निवास पर जब उनसे मिलने गया तो बड़ी हिचक के साथ उन्हें यह लघुकथा पढ़कर सुनाई। पढ़कर वह काफी देर तक कुछ नहीं बोले। बोलते तो वैसे ही बहुत कम थे, मुँह में पान होने के कारण। उनकी चुप्पी मुझे परेशान करती रही। मुझे लगा, उन्हें लघुकथा पसन्द नहीं आई है और वह इस पर चुप रहना ही बेहतर समझते हैं। फिर वह उठकर बाहर चले गए। पान थूक कर आए और मेरे पास बैठते हुए बोले- “नीरव, लघुकथा तो तुमने बहुत अच्छी लिखी है, पर मैं बस यही सोच रहा हूँ कि जो शीर्षक तुमने इसे दिया है, क्या वह सही शीर्षक है? और उन्होंने सुझाया कि इसका शीर्षक ‘मासूम सवाल’ नहीं, ‘बीमार’ होना चाहिए… यह हमारी कैसी व्यवस्था है कि हम अपने बच्चों को हिन्दी और अंग्रेजी की जिस वर्णमाला से पढ़ना सिखाते हैं, उसकी वर्णमाला में पहले अक्षर ही फलों से जुड़े होते हैं और विडम्बना यह कि हम वर्णमालाओं से फलों की जानकारी तो अपने बच्चों को देते हैं, पर उन फलों को उन्हें खिला सकने की कूवत हममें नहीं होती।” इस लघुकथा का पंजाबी, बंगला, मलयालम में अनुवाद हुआ और अब तक न जाने कितनी पत्र-पत्रिकाओं में इसका प्रकाशन हो चुका है। यहाँ मैं अपनी लघुकथाओं की श्रृंखला में वही लघुकथा आपके समक्ष रख रहा हूँ।

इसके साथ ही, नव वर्ष में आपसे अपनी एक खुशी भी साझा कर रहा हूँ। वह यह कि मेरा पहला एकल लघुकथा-संग्रह “सफ़र में आदमी” शीर्षक से नीरज बुक सेंटर, पटपड़गंज, दिल्ली से प्रकाशित होकर आ गया है। इस संग्रह की कुछ लघुकथाएं तो मैं “सृजन-यात्रा” में प्रकाशित कर चुका हूँ, शेष भी प्रकाशित करूँगा।
सुभाष नीरव
बीमार
सुभाष नीरव
''चलो, पढ़ो।''
तीन वर्षीय बच्ची किताब खोलकर पढ़ने लगी, ''अ से अनाल... आ से आम...'' एकाएक उसने पूछा, ''पापा, ये अनाल क्या होता है ?''
''यह एक फल होता है, बेटे।'' मैंने उसे समझाते हुए कहा, ''इसमें लाल-लाल दाने होते हैं, मीठे-मीठे!''
''पापा, हम भी अनाल खायेंगे...'' बच्ची पढ़ना छोड़कर जिद-सी करने लगी। मैंने उसे डपट दिया, ''बैठकर पढ़ो। अनार बीमार लोग खाते हैं। तुम कोई बीमार हो! चलो, अंग्रेजी की किताब पढ़ो। ए फॉर एप्पिल... एप्पिल माने...।''
सहसा, मुझे याद आया, दवा देने के बाद डॉक्टर ने सलाह दी थी- पत्नी को सेब दीजिये, सेब।
लेकिन मैं मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था। सब्जी भी खरीदनी थी। दवा लेने के बाद जो पैसे बचे थे, उसमें एक वक्त की सब्जी ही आ सकती थी। बहुत देर सोच-विचार के बाद, मैंने एक सेब तुलवा ही लिया था- पत्नी के लिए।
बच्ची पढ़े जा रही थी, ''ए फॉर एप्पिल... एप्पिल माने सेब.. .''
''पापा, सेब भी बीमाल लोग खाते हैं ? जैसे मम्मी ?...''
बच्ची के इस प्रश्न का जवाब मुझसे नहीं बन पड़ा। बस, उसके चेहरे की ओर अपलक देखता रह गया था।
बच्ची ने किताब में बने सेब के लाल रंग के चित्र को हसरत-भरी नज़रों से देखते हुए पूछा, ''मैं कब बीमाल होऊँगी, पापा ?''
मंगलवार, 20 दिसम्बर 2011
लघुकथा

अपनी लघुकथा ‘कड़वा अपवाद’ को यहाँ प्रस्तुत करते हुए मुझे विक्रम सोनी जी की याद हो आ रही है और याद आ रही है, उनकी पत्रिका ‘लघु आघात’। विक्रम सोनी जी जितने सशक्त लघुकथा लेखक रहे, उतने ही अच्छे एक संपादक भी रहे हैं। 'लघु आघात' के माध्यम से उन्होंने हिन्दी लघुकथा लेखन को प्रोत्साहन दिया और उसके विकास के लिए जो काम किया, वह भुलाया नहीं जा सकता। मेरे शुरुआती लेखन के समय में विक्रम जी ने मेरी कई लघुकथाएं ‘लघु आघात’ में प्रकाशित की थीं। मुझे आश्चर्य होता था कि उन दिनों ‘सारिका’ में छपी मेरी लघुकथा(ओं) पर इतना नोटिस नहीं लिया गया था, जितना 'लघु आघात' में छ्पी मेरी लघुकथाओं पर लिया गया। लघुकथा लेखन के क्षेत्र में तब सक्रिय अनेकों लेखकों ने मुझे जाना और कइयों से मेरा परिचय हुआ जो आज तक कायम है। आज लघुकथा के आकाश का यह सितारा गुमनामी के अंधेरे में है। कथाकार बलराम अग्रवाल ने बताया कि वह अब उज्जैन में रहते हैं और लिख-पढ़ सकने की स्थिति में नहीं हैं। ईश्वर उन्हें स्वस्थ-सानन्द रखे, यही कामना करते हुए आपके समक्ष अपनी लघुकथा 'कड़वा अपवाद ' प्रस्तुत कर रहा हूँ। आपकी प्रतिक्रिया की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
सुभाष नीरव
कड़वा अपवाद
सुभाष नीरव
रेलवे क्रॉसिंग। फाटक बन्द होने के कारण बस एक झटके के साथ रुक गयी। तभी एक औरत गोद में बच्चा लिये हुए बस में चढ़ी।
''बाऊजी... भाई साहब... मुसीबत की मारी गरीब आपके आगे हाथ फैलाकर भीख मांगती... रात ठंड से मेरा आदमी गुजर गया साब... ल्हास के कफन के वास्ते मांगती... झूठ नीं बोलती... बाऊजी... बच्चे की कसम खाती... पेट की खातिर नहीं, आदमी की ल्हास के वास्ते हाथ फैलाती... वहाँ गली के मोड़ पर पड़ी है ल्हास... मेरी मदद करो, मेरे माई-बाप... रुपया-दो रुपया गरीब की झोली में डालकर... भगवान आपकी मदद करेगा, मेरे मालिक...''
उसका करुण रुदन सुनकर सभी के दिल पसीजने लगे। वह बार-बार बच्चे की कसम खाती, झुककर बैठे हुए लोगों के पैरों को छूती और जोरों से प्रलाप करने लगती।
लोग अपनी जेबें टटोलने लगे। एक ने दिया तो सभी देने लगे। कोई रुपया, तो कोई दो रुपया दे रहा था। किसी-किसी ने तो पाँच-दस का नोट भी दिया। देखते-देखते, उसके पल्लू में तीस-चालीस रुपये जमा हो गये। वह फिर भी मांगे जा रही थी। मेरे पास आकर उसने मेरे पैर भी छूने चाहे। मुझे यह सब ढोंग लग रहा था। जानता था कि भीख मांगने के लिए आजकल किस-किस तरह के हथकंडे अपनाये जाते हैं। मैंने उसे बेरहमी से झिड़क दिया, ''बन्द करो यह ड्रामेबाजी... तुम्हारा कोई आदमी-वादमी नहीं मरा है... भीख मांगने का अनोखा तरीका खोज निकाला है तुम लोगों ने...''
''अरे भई, नहीं देना तो मत दो, पर बेचारी को डांटो तो नहीं...'' बस में से एक आवाज उभरी।
''यह सब नाटक कर रही है। अभी कुछ देर बाद इसका आदमी दूसरी बस में चढ़ेगा और कहेगा, मेरी औरत मर गयी... उसके कफन के वास्ते पैसे चाहिएँ...ये लोग भीख मांगने के लिए कभी अपनी माँ को मारते हैं तो कभी अपनी बीवी को...कभी बाप को तो कभी बेटे को...।''
''अरे, बेचारी अपने बच्चे की कसम खा रही है। कोई झूठ बोल रही होगी क्या ?'' दूसरी आवाज उभरी।
''जो भीख मांगने के लिए अपने आदमी को मार सकती है, उसके लिए बच्चे की कसम खाना कोई बड़ी बात नहीं है।'' मैं उत्तेजित होकर बोल रहा था, ''यह सब ढोंग है। नहीं यकीन तो चलो, मैं दिखाता हूँ... नशा करके पड़ा होगा इसका खसम...।''
मेरी बातों का कुछ असर-सा हुआ लोगों पर। फाटक अभी भी बन्द था। बस चलने में अभी काफी देर थी।
''चल, दिखा, कहाँ है लाश?'' मैंने उस औरत से कहा।
''उस गली के मोड़ पर पड़ी है।'' औरत ने इशारे से बताया।
मैंने संग चलने को कहा तो वह आनाकानी करने लगी। अब अन्य लोग भी उसके पीछे पड़ गये, ''चल दिखा, कहाँ मरा पड़ा है तेरा आदमी...।'' उसके लिए अब बचना मुश्किल था। वह चुपचाप चल दी। मैं कुछ लोगों के साथ उसके पीछे हो गया। गली के मोड़ पर पहुँचकर देखा, वहाँ कोई लाश वगैरह नहीं थी। एक विजयी मुस्कान मेरे होंठों पर तैर गई। लोगों ने सख्ती से पूछा, ''कहाँ है लाश ?... झूठ बोलती थी !''
वह रोती हुई कुछ और आगे बढ़ी।
कुछ ही दूरी पर कुछ लोग किसी को घेरे हुए खड़े थे। वह औरत आगे बढ़कर जमीन पर लेटे हुए आदमी से लिपट गयी और जोर-जोर से रोने लगी। मुझे लगा, मेरे पैर काँपने-से लगे हैं... तभी, मैं आगे बढ़कर बोला, ''साला, बन रहा है... नशा करके लेटा होगा...'' और मैंने एक झटके से उसके ऊपर की चिथड़ा हुई धोती को खींचकर एक तरफ कर दिया।
मेरे पाँव के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। वह तो सचमुच ही ठंड से अकड़कर मर चुका था।
बुधवार, 9 नवम्बर 2011
लघुकथा

मित्रो
‘वॉकर’ मेरी उन लघुकथाओं में से एक है जो मुझे भी बहुत प्रिय रही हैं। यह मेरी शुरूआती दिनों की लघुकथा है और कई बार पुरस्कृत हो चुकी है। यह उन दिनों की लघुकथा है, जब सौ रूपये का नोट बहुत अहमियत रखता था परन्तु आज सौ रूपये की कीमत कुछ भी नहीं है।
सुभाष नीरव
सुभाष नीरव

''सुनो जी, अपनी मुन्नी अब खड़ी होकर चलने की कोशिश करने लगी है।'' पत्नी ने सोते समय पास सोयी हुई मुन्नी को प्यार करते हुए मुझे बताया।
''पर, अभी तो यह केवल आठ ही महीने की हुई है!'' मैंने आश्चर्य व्यक्त किया।
''तो क्या हुआ? मालूम है, आज दिन में इसने तीन-चार बार खड़े होकर चलने की कोशिश की।'' पत्नी बहुत ही उत्साहित होकर बता रही थी, ''लेकिन, पाँव आगे बढ़ाते ही धम्म से गिर पड़ती है।''
मुन्नी हमारी पहली सन्तान है। इसलिए हम उसे कुछ अधिक ही प्यार करते हैं। पत्नी उसकी हर गतिविधि को बड़े ही उत्साह से लेती है। मुन्नी का खड़े होकर चलना, हम दोनों के लिए ही खुशी की बात थी। पत्नी की बात सुनकर मैं भी सोयी हुई मुन्नी को प्यार करने लग गया।
एकाएक पत्नी ने पूछा, ''सुनो, वॉकर कितने तक में आ जाता होगा ?''
''यही कोई सौ-डेढ़ सौ में...।'' मैंने अनुमानत: बताया।
''कल मुन्नी को वॉकर लाकर दीजियेगा।'' पत्नी ने कहा, ''वॉकर से हमारी मुन्नी जल्दी चलना सीख जायेगी।''
मैं सोच में पड़ गया। महीना खत्म होने में अभी दस-बारह दिन शेष थे और जेब में कुल डेढ़-दौ सौ रुपये ही बचे थे। मेरे चेहरे पर आयी चिन्ता की शिकन देखकर पत्नी बोली, ''घबराओ नहीं, सौ रुपये मेरे पास हैं, ले लेना। वक्त-बेवक्त के लिए जोड़कर रखे थे। कल ज़रूर वॉकर लेकर आइयेगा।''
सुबह तैयार होकर दफ्तर के लिए निकलने लगा तो पत्नी ने सौ का नोट थमाते हुए कहा, ''घी बिलकुल खत्म हो गया है और चीनी, चाय-पत्ती भी न के बराबर हैं। शाम को लेते आना। परसों दीदी और जीजा जी भी तो आ रहे हैं न!''
मैंने एक बार हाथ में पकड़े हुए सौ के नोट को देखा और फिर पास ही खेलती हुई मुन्नी की ओर। मैंने कहा, ''मगर, वह मुन्नी का वॉकर...।''
''अभी रहने दो। पहले घर चलाना ज़रूरी है।''
मैंने देखा, मुन्नी मेरी ओर आने के लिए उठकर खड़ी हुई ही थी कि तभी धम्म् से नीचे बैठकर रोने लगी।
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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011
लघुकथा

मित्रो
'सृजन-यात्रा' ब्लॉग पर जनवरी 2011 से मैंने अपनी लघुकथाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया था। अब तक कुल छह लघुकथाएं ही प्रकाशित हुई हैं। अपनी सभी लघुकथाएं एक एक करके मैं 'सृजन-यात्रा' में प्रकाशित करुँगा। मेरी ये सभी लघुकथाएं शीघ्र ही पुस्तक रूप में भी आपके समक्ष होंगी - 'सफ़र में आदमी' शीर्षक से जो भावना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित होने जा रहा है। इसी संग्रह में से इस बार प्रस्तुत है एक और लघुकथा- 'अकेला चना'... आशा है, आप अपनी प्रतिक्रिया से मुझे अवश्य अवगत करायेंगे।
आप सबको दीप-पर्व दीपावली की अनेक शुभकामनाएं....
सुभाष नीरव
अकेला चना
सुभाष नीरव
बस पहले ही आधा घंटा लेट हो चुकी थी। दफ्तर जाने वाले सभी यात्री चीख-चिल्ला रहे थे। रास्ते में चैकिंग-स्टाफ खड़ा था। बस रुकवाकर चैकिंग की जाने लगी। सभी गुस्से में बड़बड़ाने लगे। पिछले दो दिनों से मैं लेट पहुंच रहा था। बॉस ने कल वार्निंग भी दी थी। मुझसे नहीं रहा गया।
''बस पहले ही आधा घंटा लेट है। इसे रोककर चैकिंग करने से हम और लेट हो जायेंगे। आप चलती बस में चैकिंग क्यों नहीं करते ?'' सीट से उठकर मैंने चैकिंग-स्टाफ से कहा।
''तू म्हारा अफसर लागै है के ?'' उनमें से एक बोला, ''हमणै आपणी ड्यूटी करणी सै। बस लेट हो रीयै तो हम के करैं ?''
''यह गलत तरीका है आपका...!'' मैंने रोष प्रकट किया। मुझे लगा, मेरी आवाज़ हद से ज्यादा तेज़ हो गयी थी।
''घणा शोर नी कर, बस चैक होण दे।''
''चलती बस भी चैक हो सकती है। बेवजह आप बस को नहीं रोक सकते। हम सब लोग दफ्तर के लिए पहले ही लेट हुए जा रहे हैं।'' मैं अकेला ही उनसे अड़ गया।
''रोक कै ई होगी चैक...भले ही घंटा लागै।'' दूसरा चैकर मुझे घूरते हुए बोला, ''चल, आपणा टिकट दिखा।''
मैंने खीझते हुए अपना टिकट उसे थमा दिया। वह टिकट लेकर बस से नीचे उतर गया और बोला, ''इब तू नीचे आ जा... घणा शोर मचावै था, बेटिकट चले है...।''
मैंने प्रतिवाद किया, ''मेरा टिकट आपके हाथ में है, मैं बेटिकट नहीं हूँ ?''
वह हँसा। सभी चैकर मुझे घेरकर खड़े हो गये।
''इस बस का टिकट ना है ये।''
“इसी बस का है ये टिकट…” मैं लगभग चीख ही पड़ा था।
''हमणै बेईमान बताण लाग रीया सै...चल।'' उसने मुझे एक ओर धकेला और बस को चलने की व्हिसिल दे दी।
एक क्षण मैंने जाती हुई बस की ओर देखा। बस में बैठे हुए लोग उपहासभरी दृष्टि से मेरी ओर देख रहे थे।
''घणा नेता नी बणा करते... चल, निकाल सौ रुपइया...।''
हाथों में पकड़ी सौ रुपये की पर्ची को मैंने एक बार गुस्से से देखा और फिर दांत पीसते हुए उसे चिन्दी-चिन्दी करके वहीं हवा में बिखेर दिया।
